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जम्मू मीडिया बनाम कश्मीर मीडिया

संजय कुमार सिंह

कश्मीर के मीडिया में जम्मू को तरजीह नहीं दी जाती उसी तरह जम्मू के मीडिया में कश्मीर उपेक्षित रहता है, सिवाय किसी आतंकी घटनाक्रम के। यहां तक कि मीडिया का भेदभाव धार्मिक और सामाजिक स्तर पर भी अलग-अलग दिखता है। मीडिया हाउस अपने प्रोडक्ट (अखबार) के लिए आबादी के हिसाब से खबरों के चयन के मौखिक दिशा-निर्देश देता है। खासकर हिन्दी का पत्रकार इस दिशा-निर्देश के इतर दायें-बायें झांकता तक नहीं। इसलिए भी कि मीडिया हाउस को अपने प्रोडक्ट बेचने हैं तो पत्रकारों को अपनी नौकरी बचानी है। बेशक, स्थानीय समस्याओं को प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता है लेकिन उसकी तह में जाने की कोशिश नहीं की जाती कि आखिर उस समस्या का मूल कहां है। मीडिया की इस पॉलिसी का नतीजा यह हुआ कि जम्मू की जनता वह सोच नहीं रखती जो कश्मीर के लोग सोचते हैं। उतना ही सच है कि कश्मीर की जनता की सोच भी जम्मू के लोगों से मेल नहीं खाती। यह वैचारिक खाई दिनोंदिन बढ़ती ही गई।

एक राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक में स्टेट डेस्क पर काम करते हुए कुछ इसी तरह का एहसास हुआ। संभवतः 2006 में मीरवाइज वर्षों बाद कश्मीर से जम्मू आए थे। अगले दिन प्रथम पेज पर तीन कॉलम में समाचार प्रकाशित हुआ। संयोग से अखबार के बड़े अधिकारी भी वहीं थे, उन्होंने उस दिन के अखबार की समीक्षा करते हुए कहा, ‘आज का अखबार देखकर कोई भी कह सकता है कि यह कश्मीर से प्रकाशित होता है।’ उन्होंने आगे जोड़ा, ‘हमें जम्मू में अखबार बेचना है, कश्मीर में नहीं।’ जाहिर है, उन्होंने तीन कॉलम में मीरवाइज के फोटो सहित समाचार प्रकाशित करने पर आपत्ति जता दी। एक तरह से हम सबके लिए यह मौखिक दिशा-निर्देश थे। कश्मीर में इस अखबार की प्रतियां महज कुछ सौ है। कश्मीर घाटी में अखबार (कुछ सौ ही सही) भेजने जरूरी है क्योंकि जम्मू-दिल्ली से पहुंचने वाले ‘साहब’ को डल झील और कश्मीर घाटी के सैर सपाटे में कोई तकलीफ न हो। जम्मू से प्रकाशित होने वाले ज्यादातर अखबारों में कश्मीर में घटित किसी बड़े राजनीतिक घटनाक्रम को ‘अपने हिसाब’ से प्रकाशित किया जाता है। उदाहरण के तौर, मीरवाइज, यासर अंसारी अथवा गिलानी की गिरफ्तारी अथवा नजरबंद की खबर कश्मीर से प्रकाशित अखबारों में चार से पांच कॉलम में लगाई जाती है। जबकि इसी समाचार को जम्मू से प्रकाशित अखबारों में पेज थ्री या फिर अंतिम पेज पर लगाया जाता है। कभी कभार पेज एक पर सिंगल कॉलम में भी लगा दिया जाता है। अमरनाथ यात्रा के दौरान जम्मू से प्रकाशित अखबारों में कैम्पों (अमरनाथ यात्रियों के लिए) से पल-पल की जानकारी प्रमुखता से पुलआउट या मुख्य अखबार के पेजों पर दी जाती है। इस लगभग दो महीने की यात्रा में अमूमन फोटो फीचर सहित समाचारों को प्रमुखता से लगाया जाता है। अमरनाथ यात्रियों को रास्ते में होने वाली समस्याओं को श्रीनगर के अखबारों के बजाये जम्मू से प्रकाशित अखबार प्रमुखता से प्रकाशित करते हैं। ऐसा वर्षों से हो रहा है।

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जम्मू में हिन्दुओं की आबादी लगभग 90 प्रतिशत और मुसलमानों की आबादी 10 प्रतिशत हैं। अमरनाथ यात्रा या फिर वैष्णो देवी की यात्रा से संबंधित समाचार जम्मू के अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित होते हैं। कश्मीर से प्रकाशित अखबारों में दोनों धार्मिक यात्राओं से संबंधित समाचारों को उतनी जगह नहीं दी जाती। आबादी और प्रकाशित होने वाले समाचारों में एक तरह से अन्योन्याश्रय संबंध बन गए हैं। कश्मीर से प्रकाशित कई अखबारों में समाचारों को देखकर यह आभास हो जाएगा कि नई दिल्ली से उसकी दूरी कितनी बढ़ती जा रही है। अलगाववादी नेताओं के भाषण यहां प्रमुखता से प्रकाशित किए जाते रहे हैं।

इतना ही नहीं बंटवारे के बाद विस्थापित होकर आए आज भी सैकड़ों नहीं हजारों हिन्दू परिवार आज भी नागरिकता (जम्मू कश्मीर में इसे स्टेट सब्जेक्ट कहा जाता है) के लिए तरस रहे हैं। सात दशक के राजनीतिक आश्वासनों का कुल जमा परिणाम यही रहा है कि हजारों हिन्दू परिवार कठुआ सहित जम्मू संभाग के अन्य भागों में ‘विस्थापित’ ही हैं। बंटवारे के बाद से विस्थापित इन हिन्दू परिवारों की जायज मांगों को भी जम्मू से प्रकाशित समाचार पत्र कभी कभार ही ‘ज्ञापन सौपा’ की तरह किसी कोने में समाचार लगा देते हैं। कश्मीर से प्रकाशित समाचार पत्रों में इन विस्थापित हिन्दुओं को कितनी जगह मिल पाती होगी, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। रिसायत काल में जम्मू-कश्मीर में हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल आज भी किस्सों में गूंजती हैं। मुस्लिम प्रजा को भी अपने हिन्दू राजा पर जितना भरोसा था वह भरोसा अब तक राजनीतिक दल हासिल नहीं कर सके हैं। घाटी में एक बात खूब प्रचलित है कि आपके सौ दुश्मन भले हों, पर एक कश्मीरी (कृप्या यहां हिन्दू और मुसलमान के चश्मे से न देखें) आपका दोस्त है तो वह अकेला आपके सौ दुश्मनों पर भारी है। कश्मीरियों ने बंटवारे के बाद कबाइलियों को अपने इसी जज्बे से खदेड़ दिया था।

संजय कुमार सिंह, राजस्थान के एक दैनिक अखबार में कार्यरत हैं। पहले वह दैनिक जागरण के जम्मू संस्करण में काम कर चुके हैं।

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