
यह अध्ययन फिल्मों और सीरीज के माध्यम से इस बात की पड़ताल करता है कि हिन्दी सिनेमा अब आदिवासी समाज को किस प्रकार से देखता है, किस प्रकार उसे कहानी की परिधि से उठाकर मुख्य स्थान प्रदान करता है, और भविष्य में इस विमर्श की संभावनाएं कहां तक विस्तारित हो सकती हैं। दृश्य-भाषा, अकादमिक विमर्श और मानवीय संवेदना का समन्वय करते हुए, यह विश्लेषण सिनेमा के भीतर उभरती एक समकालीन सांस्कृतिक चेतना को सामने लाने का प्रयास करता है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी सिनेमा में आदिवासी समुदाय का चित्रण सीमित और बने बनाये फामूर्ले में बंधा रहा। आप उन्हें प्रायः लोकनृत्य करते हुए, रंगीन वस्त्रों में सजे और कथानक से असंबद्ध के रूप में फिल्मों में देख सकते हैं। ये दृश्य और कहानी ‘लोकेशन’ के सौंदर्य को और समृद्ध ने करने वाले एक एलिमेंट के तौर पर हमें दिखाई देते हैं इस प्रवृति में हाल के वर्षों में बदलाव दिखाई देने लगे हैं
अब कैमरा केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि संघर्ष,अस्मिता और प्रतिरोध को भी पकड़ने लगा। यह कैमरा अब देखने लगा कि जंगल के भीतर कौन रहता है,वह किस भाषा में सोचता है,उसकी पीड़ा और प्रतिरोध के स्वरूप क्या हैं,और उसका सांस्कृतिक स्वाभिमान किन प्रतीकों में व्यक्त होता है।
हिन्दी सिनेमा की नई यात्रा तभी सार्थक होगी, जब वह आदिवासी दृष्टिकोण को केवल विषयवस्तु नहीं, बल्कि दृष्टि, संवेदना और संरचना के स्तर पर आत्मसात करेगा। जब आदिवासी कलाकार, लेखक, निर्देशक और तकनीशियन सिनेमा की मुख्यधारा में अपनी शर्तों पर शामिल होंगे, तब यह विमर्श स्थायी और परिवर्तनकारी रूप ले सकेगा। क्योंकि उनके ज्ञान पर पहला हक सिर्फ उनका है और वह उसे ज्यादा बेहतर तरीके से दुनिया के सामने रख सकते हैं।
अगस्त के 161 अंक में..








