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आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) क्या है

 

यह अध्याय न्यायिक और अदालत-प्रशासन के कामकाज से जुड़े एआई संबंधी शब्दों और अवधारणाओं को समझाता है। कानूनी शोध, रजिस्ट्री के कामकाज, केस मैनेजमेंट, अनुवाद सेवाओं और अन्य न्यायिक प्रक्रियाओं में एआई के बढ़ते उपयोग को देखते हुए एक स्पष्ट और संदर्भ-आधारित शब्दावली ज़रूरी हो जाती है। इस अध्याय में आधुनिक एआई प्रणालियों से जुड़ी मुख्य अवधारणाओं की परिभाषाएं दी गई हैं। जैसे कि मशीन लर्निंग, एल्गोरिद्म, जनरेटिव मॉडल, भ्रम (हैल्यूसिनेशन), पूर्वाग्रह (बायस) और डिजिटल मैनिपुलेशन तकनीक। यह हर शब्द न्यायिक प्रक्रियाओं में कैसे प्रकट होता है, इनकी सविस्तार व्याख्या की गई है।

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई): एआई ऐसे मशीन-आधारित सिस्टम हैं जो आमतौर पर इंसानों की सोचने-समझने की क्षमता से जुड़े काम कर सकते हैं। जैसे कि तर्क करना, पैटर्न पहचानना, भाषा समझना और संरचित तरीके से निर्णय लेना। ये सिस्टम बहुत बड़ी मात्रा में जानकारी का विश्लेषण करते हैं, उसमें छिपे पैटर्न पहचानते हैं और फिर वर्गीकरण, अनुवाद, कानूनी सारांश, सिफ़ारिशें, पूर्वानुमान या ऐसे अन्य स्वचालित आउटपुट तैयार करते हैं, जो डिजिटल या भौतिक वातावरण को प्रभावित कर सकते हैं।

न्यायिक संदर्भ में देखें तो एआई में ऐसे तकनीकी औज़ार हैं जो न्यायिक और प्रशासनिक कामों में मदद करते हैं या उन्हें मज़बूत बनाते हैं। जैसे कि दस्तावेज़ों का वर्गीकरण, याचिकाओं का अनुवाद, कानूनी शोध, मामलों की तारीख़ तय करना, फ़ाइलिंग में खामियां पहचानना और बड़े डेटाबेस से जानकारी निकालना।

न्यायिक प्रणालियों में एआई के उपयोग के लिए दो प्रमुख श्रेणियां अहम हैं—

(क) मशीन लर्निंग आधारित एआई

(ख) ज्ञान-प्रतिनिधित्व या नियम आधारित एआई

सरल शब्दों में मशीन लर्निंग ऐसे एआई (AI) सिस्टम हैं, जो डेटा से पैटर्न सीखते हैं और समय के साथ बेहतर होते जाते हैं। न्यायिक कामकाज में मशीन लर्निंग टूल को अदालत के पुराने डेटा पर प्रशिक्षित किया जा सकता है, जैसे कॉज़ लिस्ट, आदेश और केस कैटेगरी। ताकि वे अनुमान लगा सकें या भविष्य के बारे में बता सकें। उदाहरण के लिए, भारत के सुप्रीम कोर्ट का “सुपेस” (सुप्रीम कोर्ट पोर्टल फॉर असिस्टेंस इन कोर्ट एफीशियंसी) मशीन लर्निंग तकनीकों का इस्तेमाल करके बड़े केस रिकॉर्ड से ज़रूरी तथ्य, दस्तावेज़ और मिसालें निकालता है और जजों को जटिल मामलों को व्यवस्थित करने में मदद करता है। इसी तरह, कई सालों की कॉज़ लिस्ट पर प्रशिक्षित कोई मशीन लर्निंग नई फ़ाइलिंग को अपने-आप अलग-अलग श्रेणियों में बांट सकता है, जैसे कि आपराधिक अपील, सेवा मामले, टैक्सेशन या भूमि अधिग्रहण। इससे रजिस्ट्री का काम तेज़ और प्रभावी होता है।

इसके उलट ज्ञान-प्रतिनिधित्व और नियम आधारित एआई सिस्टम डेटा से सीखते नहीं हैं, बल्कि पहले से तय किए गए तार्किक ढांचों पर काम करते हैं, जिनमें क़ानूनी नियम, प्रक्रिया संबंधी नियम या क़ानून की शर्तें दर्ज होती हैं। ऐसे सिस्टम साफ़-सुथरे नियमों को लगातार और एक समान तरीके से लागू करने के लिए बनाए जाते हैं। न्यायिक प्रशासन में कोई नियम आधारित सिस्टम इस तरह प्रोग्राम किया जा सकता है कि वह फाइलिंग में प्रक्रिया संबंधी खामियां पहचान ले। मसलन हलफ़नामा न होना, गलत कोर्ट फीस, या लिमिटेशन की अर्जी का न होना। सुप्रीम कोर्ट का “सुवास” (सुप्रीम कोर्ट विधिक अनुवाद सॉफ्टवेयर) इसका एक अहम उदाहरण है, जो नियमों और भाषा संरचना के आधार पर फैसलों और आदेशों का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद करता है।

एल्गोरिद्म: एल्गोरिद्म निर्देशों या तार्किक कदमों का एक स्पष्ट और सीमित क्रम होता है, जिसका पालन कोई कंप्यूटर सिस्टम या एआई मॉडल जानकारी को प्रोसेस करने, समस्या हल करने या इनपुट को सार्थक आउटपुट में बदलने के लिए करता है। एल्गोरिद्म यह तय करता है कि डेटा का विश्लेषण कैसे होगा, कौन-से ऑपरेशन होंगे और किस क्रम में होंगे, ताकि नतीजे एक जैसे और अनुमानित रहें।

न्यायिक संदर्भ में देखें तो एल्गोरिद्म कई डिजिटल और एआई-सक्षम अदालत प्रक्रियाओं से जुड़े होते हैं। जैसे ई-फ़ाइलिंग सिस्टम में लगा कोई एल्गोरिद्म अपने-आप जांच सकता है कि याचिका में सभी ज़रूरी दस्तावेज़ हैं या नहीं, कोर्ट फीस सही है या नहीं, या मामला लिमिटेशन के भीतर है या नहीं। ऐसा एल्गोरिद्म चरण-दर-चरण प्रक्रिया नियम लागू कर सकता है। जैसे कि “अगर हलफ़नामा नहीं है, तो डिफ़ेक्ट दिखाओ” या “अगर अपील समय-सीमा के बाद दायर हुई है, तो कंडोनेशन की अर्जी मांगो”, जिससे रजिस्ट्री स्टाफ को मदद मिलती है और मानवीय गलतियां कम होती हैं।

जनरेटिव एआई: यह दरअसल एआई का वह प्रकार है जो नई सामग्री बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया होता है। जैसे कि टेक्स्ट, इमेज, ऑडियो या कोड। और यह सब बड़े डेटा सेट से सीखे गए पैटर्न के आधार पर करता है। पारंपरिक एआई सिस्टम, जहां ज्यादातर जानकारी को वर्गीकृत करने, अनुमान लगाने या ढूंढ़ने तक सीमित होते हैं, वहीं जनरेटिव मॉडल यूज़र के दिए गए निर्देशों के आधार पर बिल्कुल नया आउटपुट तैयार कर सकते हैं।

ये मॉडल उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं, जैसे कि लार्ज लैंग्वेज मॉडल या डिफ्यूज़न मॉडल, ताकि ऐसा सुसंगत लेखन, वास्तविक दिखने वाले विज़ुअल या संरचित डेटा तैयार किया जा सके, जो पूर्व में मौजूद प्रशिक्षण सामग्री का सीधा हिस्सा नहीं होता।

भ्रम (हैल्यूसिनेशन): एआई हैल्यूसिनेशन तब होता है जब कोई एआई सिस्टम ऐसा कंटेंट बना देता है, जो तथ्यात्मक रूप से ग़लत, तार्किक रूप से असंगत या पूरी तरह मनगढ़ंत होता है, लेकिन दिखने में भरोसेमंद और प्रभावशाली लगता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि जनरेटिव मॉडल तथ्यों की जांच नहीं करते, बल्कि प्रशिक्षण डेटा के आधार पर शब्दों या पैटर्न की संभावित कड़ियां बनाते हैं। हैल्यूसिनेशन अक्सर तब सामने आता है, जब प्रशिक्षण डेटा में कमी हो, डेटा में पहले से मौजूद पूर्वाग्रह हो, या उपयोगकर्ता या यूजर का निर्देश मॉडल की जानकारी की सीमा से बाहर चला जाए। कई देशों की अदालतों में ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जहां एआई टूल्स द्वारा बनाए गए मनगढ़ंत केस की फाइलिंग देखी गई, जिसके चलते जुर्माने लगे, सख़्त टिप्पणियां हुईं और एआई से बनी सामग्री की अनिवार्य जांच के निर्देश दिए गए।

लार्ज लैंग्वेज मॉडल: यह जनरेटिव एआई का ही एक प्रकार है, जो बहुत बड़ी मात्रा में टेक्स्ट डेटा से पैटर्न सीखकर इंसानों के समझने लायक प्राकृतिक भाषा में आउटपुट तैयार कर सकते हैं। ये मॉडल खोज, अनुवाद और सारांश बनाने से लेकर नया कंटेंट तैयार करने का काम कर सकते हैं। जैसे कि टेक्स्ट, इमेज और यहां तक कि कंप्यूटर कोड भी। न्यायिक संदर्भ में लार्ज लैंग्वेज मॉडल आधारित सिस्टम तथ्यों और मुद्दों का सार तैयार करने और जज के फैसले के पीछे की तर्क-प्रणाली को ड्राफ्ट करने में काफी सक्षम साबित हो रहे हैं।

प्रॉम्प्ट: प्रॉम्प्ट वह निर्देश या इनपुट होता है, जो यूज़र एआई मॉडल को देता है, ताकि उसकी ज़रूरत के अनुसार आउटपुट मिल सके। आम तौर पर प्रॉम्प्ट टेक्स्ट के रूप में होता है, लेकिन अब कई एआई मॉडल आवाज़ के ज़रिये भी प्रॉम्प्ट लेने में सक्षम हैं। चूंकि एआई सिस्टम असल समझ के बजाय सांख्यिकीय पैटर्न पर काम करते हैं, इसलिए अगर प्रॉम्प्ट साफ नहीं है या जरूरी जानकारी नहीं देता, तो लार्ज लैंग्वेज मॉडल यूज़र की मंशा को गलत समझ सकता है या ख़ुद ही गलत मान्यताएं जोड़ सकता है। इसलिए एक अच्छा, संरचित प्रॉम्प्ट ज़रूरी है।

एक प्रभावी प्रॉम्प्ट आमतौर पर तीन चरणों में दिया जाता है- इरादा, संदर्भ और निर्देश। पहले इरादा बताया जाता है, यानी सवाल का उद्देश्य। फिर संदर्भ दिया जाता है, जिसमें पृष्ठभूमि या जरूरी जानकारी होती है। अंत में निर्देश होता है, जो साफ-साफ बताता है कि एआई को करना क्या है। इन तीनों के सही मेल से प्रॉम्प्ट ज्यादा सटीक बनता है और बेहतर, तेज़ व गुणवत्तापूर्ण आउटपुट मिलता है।

पूर्वाग्रह (बायस): पूर्वाग्रह का मतलब है निर्णय लेने की प्रक्रिया में होने वाली ऐसी व्यवस्थित गलती, जिसके चलते नतीजे अनुचित हो जाते हैं। एआई के मामले में बायस कई वजहों से आ सकता है- जैसे डेटा इकट्ठा करने के तरीक़े, एल्गोरिद्म की डिज़ाइन या इंसानी व्याख्या। अक्सर यह बायस उस सामाजिक और संरचनात्मक पक्षपात से आता है, जो प्रशिक्षण डेटा में पहले से मौजूद होता है। एल्गोरिद्म में सुधार, पैटर्न के बेहतर अनुकूलन और इंसानों के सकारात्मक हस्तक्षेप से एआई सिस्टम में बायस की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

डीपफेक: डीपफेक ऐसा एआई-निर्मित इमेज, ऑडियो या वीडियो होता है, जो दिखने में एकदम असली लगता है और वास्तविक लोगों, वस्तुओं, जगहों या घटनाओं जैसा प्रतीत होता है, लेकिन असल में वह झूठा और जानबूझकर बदला हुआ होता है। यह असली और नकली सामग्री के बीच की रेखा को धुंधला कर देता है, जिससे ग़लत जानकारी फैलने, जनमत को प्रभावित करने, लोकतंत्र को नुक़सान, धोखाधड़ी, पहचान की चोरी, मानहानि और अन्य गंभीर समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।

(इस अध्याय को सुप्रीम कोर्ट के शोध केन्द्र ने तैयार किया है।)

 

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