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लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया कंपनी नहीं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है

समाज नेतृत्व, नीति और नारों से निर्देशित होता है। यहां केवल हम नारों के महत्त्व को समझने की कोशिश कर सकते हैं। नारा एक संप्रेषण होता है, जिसमें प्रेरणा, उत्साह, उर्जा, दिशा, दृष्टि आदि जैसे भाव और विचार होते हैं। राजनीतिक नारों का एक क्षेत्र होता है, तो दूसरा आर्थिक प्रगति और सामाजिक सुधार की सीमाओं को प्रभावित करता है। जैसे राजनीतिक क्षेत्र में ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा आया तो वह भारत जैसे पिछड़े नव-स्वतंत्र देश के लिए सुरक्षा और उत्पादन के महत्त्व को दर्शाता है। इस नारे के विस्तार में कई तरह से व्याख्या की जा सकती है। यहां इस बात को स्पष्ट करने की कोशिश की जा रही है कि देशकाल विशेष के संदर्भ में विभिन्न स्तरों पर नारे सामने आते हैं। उनका महत्त्व एक समय तक भी सीमित हो सकता है या वे एक खास तरह की व्यवस्था के संदर्भ में व्यवस्था के साथ जुड़ जाते हैं। जैसे संसदीय लोकतंत्र में यह एक संवैधानिक ढांचागत व्यवस्था है कि उनके तीन अंग- विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका होते हैं। लेकिन लोकतंत्र में एक चौथे स्तंभ की भी बात की जाती है, जबकि वह संवैधानिक ढांचागत व्यवस्था से जुड़ा नहीं होता है। भारतीय संविधान को यदि देखें तो संसदीय लोकतंत्र के केवल तीनों अंगों के बीच संतुलन बनाने पर महत्त्व दिया गया है। फिर यह चौथे स्तंभ की कहानी लोकतंत्र से कैसे जुड़ी और उसकी क्या प्रासंगिकता है?

लोकतंत्र के चौथा स्तंभ आखिरकार क्या है? संदर्भ ग्रंथों के हवाले से यह बताया जाता है कि एडमंड बर्क ने प्रेस की स्वतंत्रता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताया है। वे 1730 में जन्मे और 1797 तक सक्रिय रहे। वे एक राजनीतिक सिद्धांलोकतंत्र थे। पहले यहां यह स्पष्ट कर लेना चाहिए कि एडमंड बर्क ने प्रेस की स्वतंत्रता को चौथा स्तंभ बताया। यानी प्रिटिंग की सुविधा आने के बाद शासन प्रणाली से उसके जुड़ाव के महत्त्व को स्पष्ट किया गया है। इस संदर्भ में दो बातें और समझने की जरूरत पड़ती है। पहला तो यह कि संसदीय एक शासन प्रणाली है, जबकि लोकतंत्र एक विचारधारा है। इसका यह अर्थ यह हुआ कि लोकतंत्र की विचारधारा के लिए एक शासन प्रणाली विकसित की गई। उस शासन प्रणाली में अनुभव के आधार पर एक चौथे स्तंभ को जोड़ना एडमंड बर्क को आवश्यक लगा। इससे पूर्व जॉन लॉक (1632- 1704) ने लोकतंत्र के विचार को इस तरह से विस्तार दिया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बिना लोकतंत्र खोखला विचार है। वे विद्रोह करने तक की स्वतंत्रता देने के समर्थक थे। फ़्राँस्वा-मारी अरूऐ का उपनाम वॉल्तैर है। उन्होंने भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की विचारधारा से जोड़ा।

हमें यहां दो स्थितियों को अलग-अलग करके समझना है। पहला तो लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार निहित होना चाहिए। दूसरा संसदीय शासन प्रणाली में प्रेस की आजादी का अधिकार है।

भारतीय संविधान में लोकतंत्र के लिए नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। इसे घारा 19(ए) में परिभाषित किया गया है। भारतीय संविधान में प्रेस की आजादी या आज की भाषा में मीडिया की आजादी का कोई उल्लेख नहीं किया गया है।

यहां इस प्रश्न का विश्लेषण करना है कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार सुरक्षित होना महत्त्वपूर्ण है या फिर संसदीय प्रणाली में प्रेस अथवा मीडिया की आजादी का ही महत्त्व है।

भारतीय संविधान के संदर्भ में यदि इसका विश्लेषण करें, तो यह स्पष्ट है कि नागरिकों के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार सुनिश्चित किया गया है। जिस अधिकार का उपयोग वह नागरिक या नागरिक समूह भी कर सकता है, जो कि जनसंचार के क्षेत्र में व्यापार करना चाहते हैं। संविधान एक वैचारिक दस्तावेज होता है और उसका उद्देश्य अपने लक्षित वैचारिक समाज व्यवस्था को विकसित और सुरक्षित करने के लिए एक शासन प्रणाली विकसित करना होता है। इस तरह हम यह पाते हैं कि लोकतंत्र के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार ही महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

इस पहलू का अध्ययन करें कि भारत में ब्रिटिश शासन के समाप्त होने के बाद संसदीय लोकतंत्र के लिए किस नारे का सर्वाधिक प्रचार हुआ।

1. लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अभिव्यक्ति की आजादी है।

2. लोकतंत्र का चौथा स्तंभ प्रेस होता है। मौजूदा दौर की भाषा में कहें कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है।

यह शायद ही नारा सुनने या उसका प्रचार प्रसार देखने को मिलता है, जिसमें लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार को माना जाता है। प्रत्येक नागरिक को संविधान में यह अधिकार प्राप्त है। नागरिक न केवल संसदीय प्रणाली की बुनियादी ईकाई है, बल्कि वह लोकतंत्र की विचारधारा का भी बुनियाद है। लेकिन वह कोई संगठन व संस्था नहीं है।

दरअसल, ब्रिटिश शासन के समाप्त होने के बाद और उसके पूर्व भी इस नारे को ही लोकप्रियता के शिखर पर रखने के प्रयास हुए, जिसमें कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में प्रेस अथवा मीडिया को माना गया है। एडमंड बर्क के नाम से यह नारा उद्धृत किया जाता है, लेकिन बुनियादी नारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है, जो एडमंड बर्क से पूर्व एक अवधारणा के स्तर पर विकसित हो चुका था। नागरिकों की अभिव्यक्ति की आजादी की स्वतंत्रता ही वास्तव में चौथा स्तंभ है, जो कि ढांचागत नहीं है। जब अभिव्यक्ति की आजादी की स्वतंत्रता के स्वयं ही चौथे स्तंभ के रूप में देखने की अवधारणा विकसित हुई, तो उसका एक दर्शन है। यह आवधारणा दर्शन के स्तर पर विकसित हुई है, न कि किसी एक ढांचागत स्वरूप में मान्यता प्राप्त है। चौथे स्तंभ की अवधारणा उसी तरह से किसी स्तर पर ढांचागत नहीं है, जिस तरह से लोकतंत्र की विचारधारा है।

सवाल यह है कि अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार आमतौर पर बहाल नहीं हो, तो क्या प्रेस या मीडिया चौथे स्तंभ के रूप में बना रह सकता है। प्रेस या मीडिया जनसंचार के माध्यम होते है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता माध्यम पर निर्भरता नहीं रख सकती है। चूंकि प्रेस या मीडिया किसी कंपनी या किसी विशेष समूह द्वारा संचालित व नियंत्रित होती है और कई स्तरों पर स्रोतों की उपलब्धता के साथ संगठित होती है, इसीलिए 1947 से पूर्व और उसके बाद भी यह नारा अपनी लोकप्रियता बनाने में कामयाब रहा है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ प्रेस होता है। प्रेस टेक्नोलॉजी है। उसकी स्वतंत्रता नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जनसंचार के रूप में संगठित करने के अर्थों में निहित है। न कि किसी कंपनी और खास आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक हितों से जुड़े समूह के अर्थ में उसके चौथा स्तंभ होने से जुड़ता है।

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में प्रेस के नारे को प्रेस या मीडिया को संचालित व नियंत्रित करने वाली कंपनियों व समूहों ने इस नारे को लोकप्रिय बनाने में पूरी ताकत लगी दी। जबकि ब्रिटिश काल में भी यह देखा गया कि बड़ी-बड़ी कंपनियों द्वारा संचालित प्रेस यानी समाचार पत्रों ने अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार के बजाय अपने हितों को तरजीह दिया। जबकि ब्रिटिश सत्ता से मुक्ति के लिए आम लोग संघर्ष कर रहे थे और स्वयं को संगठित करने की कोशिश कर रहे थे। 1947 के बाद तो भारतीय संसद के दस्तावेजों में संसदीय प्रतिनिधियों के इस तरह के भाषण भरे पड़े हैं, जिनमें समाचार पत्र व प्रकाशन नियंत्रित और संचालित करने वाली कंपनियां व फर्म अपने फायदे के लिए आम लोगों के अभिव्यक्ति के विचारों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है। आर्थिक ताकत के बूते ये कंपनियां समाज में अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का इस्तेमाल कर लोगों के बीच में झगड़े-फसाद को बढ़ावा दे रही है। 1955 के अगस्त महीने में प्रेस आयोग के प्रतिवेदन पर संसद में बहस का रिक़ॉर्ड देखें। यह स्पष्ट होता है कि ब्रिटिश सत्ता की गुलामी से आजादी के बाद कैसे खास तरह के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक समूह प्रेस पर अपना एकाधिकार बनाए रखने की योजना को लेकर सक्रिय है।

एडमंड बर्क के नारे को आजादी के बाद भी ज्यादा से ज्यादा लोकप्रिय करने का यह नतीजा देखा गया कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में अभिव्यक्ति की आजादी का नारा पृष्ठभूमि में धंसता चला गया। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में मीडिया कंपनियां मजबूत होती चली गईं, और मीडिया पर उनका एकाधिकार मजबूत होता चला गया। देश की लगभग 50 कंपनियां हैं, जो जनसंचार के तंत्र को नियंत्रित व संचालित करती है।

दूसरी तरफ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की चेतना नागरिकों के स्तर पर कुंठित हुई। इससे ज्यादा महत्त्वपूर्ण यह पहलू है कि नागरिकों की यह चेतना विकसित होने के बजाय प्रेस या समाचार पत्र चलाने वाली कंपनियों पर निर्भरता की शिकार हो गई। आजादी के मूल में आत्म निर्भरता का भरोसा रहा है। लेकिन उसके स्रोत के रूप में विकसित किए अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार के सामने परजीविता की स्थितियां विकसित की गई। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का आखिर क्या अर्थ है? यह माना जाता है कि लोकतंत्र की विचारधारा को मजबूत, विकसित और सुरक्षित रखने के लिए जो व्यवस्थागत ढांचा तैयार किया गया है, उस पर निगरानी रखने की चेतना। निगरानी का रिश्ता प्रश्न और सुधार से जुड़ा है। वह सुधार से ज्यादा परिवर्तन करने तक जाता है। प्रेस को भी जब चौथे स्तंभ के रूप में प्रचारित किया जाता है, तो उसका भी महत्त्व उसकी निगरानी के रूप में व्यक्त किया जाता है। लेकिन नागरिक और किसी कंपनी की निगरानी के बीच एक बुनियादी फर्क होता है। नागरिक की निगरानी यानी समस्त नागरिकों की नजर और अपेक्षा से जुड़ा होता है, जबकि कंपनी की निगरानी उसके हितों से टकराती है। उसके हितों से सुझाव और सुधार की दृष्टि नत्थी होती है।

अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार ही लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। आधुनिक राष्ट्र राज्य की अवधारणा में लोगों के नागरिक होने की अवस्था का काल चुनौतीपूर्ण माना जाता है। हम भारत के लोग नागरिक होने की शपथ संविधान की प्रस्तावना के साथ ले रहे है, तो नागरिक तक की अवस्था विकसित करना लोगों के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है। लोगों को ही अपने अधिकार यानी अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार को चौथे स्तंभ के रूप में स्वीकार्य करना और उसके लिए अपने भीतर ग्रहणशीलता विकसित करना है। कंपनियों व किसी खास समूह पर उसकी निर्भरता लोकतंत्र की विचारधारा को कमजोर करती है।

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